मुख्यपृष्ठ

   सम्यकदर्शन, ज्ञान और चारित्र ही  मोक्षमार्ग है। ऐसी बात को बहुत  सरल  रुप से बताने वाले आचार्य भगवन्त प.पू. आध्यात्म योगी १०८ श्री विशुद्धसागर जी महाराज यथा नाम तथा गुण रुप है। जैसा नाम है, वैसा ही आचरण है।

आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज को तत्वो का इतना गहन चिन्तवन है कि जिनवाणी उनके कण्ठ मे विराजमान रहती है।

आचार्य श्री के प्रवचन इतने सरल व स्यादवाद से भरे होते है कि हमारे अष्टमूल गुण तो क्या, अणुव्रत और महाव्रत तक लेने के भाव हो जाते है।इनके प्रवचन मे  स्यादवाद व अनेकान्त रुपी शस्त्र से मिथ्यात्व का शमन तो सहज ही झलकता है। प्रवचन सुनकर ऎसा लगता है कि हमारे ही बारे मे बात कही जा रही हो।

परम पूज्य मुनि श्री १०८ विशुद्ध सागर जी महाराज को परम पूज्य आचार्य श्री १०८ विराग सागर जी के कर कमलो से ३१ मार्च २००७ को मुनि दीक्षा के १५ वर्ष ६ माह बाद ३५ वर्ष की आयु में दिनांक ३१ मार्च २००७ को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया।

आचार्य श्री के बारे मे जितना कहे कम है, हे गुरुवर, आचार्य भगवन्त नमोस्तु शासन को सदा जयवतं रखे। आचार्य श्री के बारे में और जानने के लिए यहाँ क्लिक करे

विशुद्ध वचन

2

 

 आचार्य श्री के ग्रन्थ डाउनलोड करने के यहाँ क्लिक करे