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तप का फल व्यर्थ नहीं जाता

यदि विधि होगी तो विधि मिलेगी और नहीं होगी तो नहीं मिलेगी। भूख से कम भोजन करना भी बडा तप है। जीव के पुण्य क्षीण होने लगे तो उसके चेहरे से खुशी गायब हो जाती है। उसके भाव विशुद्ध नहीं रहते हैं। तप का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता हैं।

उन्होंने कहा जो विद्यार्थी तपस्या नहीं करता है। वह फेल हो जाता है। विद्यार्थी जीवन में जिसने भी संयम धर्म का पालन कर लिया। तो वह कभी किसी भी परीक्षा में फेल नहीं होता है। उदाहरण देते हुए बताया कि दूध को तपाने के लिए बर्तन की आवश्यकता होती है। और यदि वर्तन न हो तो दूध को तपाया नहीं जा सकता है।

साधना वह है जो नदी की धार बनके बहे। साधना वह नहीं जो बिल्ली की आवाज बनकर निकले। मोक्ष मार्ग की साधना रत्नात्रय के पालन में है। श्रेष्ठ मार्ग से नीचे की ओर उतरना महापुरूषों का काम नहीं है। तीर्थकर संस्कृति, श्रवण संस्कृति में गिरकर मोक्ष मार्ग ग्रहण नहीं किया जाता है। घर में लडडू जब बन पाते है जब चाशनी से तार टूटना प्रारंभ हो जाए।

चमत्कार मात्र आश्चर्य दोष

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि चमत्कार आश्चर्य दोष है।जिनेन्द्र वाणी में सारे तंत्र-मंत्र निहित है, इसलिए अपने को चमत्कारिक शक्तियों में मत उलझाओ।

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन की हर विधा को दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से समझना चाहिए। बीमारी का उपचार चाहिए तो आचार व विचार शुद्ध करो। चांडाल का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने कहा कि चांडाल ने चतुर्दशी के दिन हिंसा न करने का नियम लेकर अपने को धर्मात्मा का पात्र बना लिया, इसलिए इंसान भी अगर नियमों में बंधकर अपना जीवन जीता है तो उसे बिना चमत्कारिक शक्ति के ही अपना जीवन चमत्कारिक लगेगा। उन्होंने कहा कि भगवान की मूर्ति को निहारोगे तो बुद्धि बढ़ेगी, नासाग्र दृष्टि से देखोगे तो बुद्धि बढ़ेगी लेकिन यथार्थ से हटकर कार्य करोगे तो मिथ्यात्व प्रकट होगा। इससे पूर्व मुनि विशोग सागर जी ने कहा कि संसार की वस्तुओं में सुख होता तो तीर्थंकर संसार को क्यों छोड़ते? भरत चक्रवर्ती 6 खण्ड का अधिपति था लेकिन उसे भी संसार के वैभव में सुख नजर नहीं आया। 

जल संरक्षण सबसे बड़ी अहिंसा है

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने जल संरक्षण को अहिंसा परमो धर्म का प्रतीक बताते हुए कहा कि सरकार भले ही जल के प्रति अब जाग रही है लेकिन जैन दर्शन ने बहुत पहले ही जल संरक्षण को महत्व दिया है।

उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ के समय से जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाता रहा है। जितना जल बचाएंगे उतनी ही हिंसा से बचेंगे। उन्होंने जैन समाज के लोगों से पानी की शुद्धता के प्रति जागृति पैदा करने का आह्वान किया। उन्होंने जैन धर्म को मर्यादित धर्म बताते हुए कहा कि गुरू के नाम पर जैन धर्म को मत बांटो क्योंकि जब महावीर एक है तो धर्म अलग -अलग नहीं हो सकता है। इससे पूर्व मुनि विशोग ने प्रवचनों में कहा कि मनुष्य जीवन एक चौराहा है। इंसान नर से नारायण बन सकता है । सम्यक्तव का भाव धारण कर स्वर्ग में भी जा सकता है। मायाचारी और छल-कपट करोगे तो तिर्यंच गति में जाओंगे। अब इंसान को निर्णय करना है कि उसे कहा जाना है। इंसान को जन्म के साथ ही अमृत मिला है। इंसान उस अमृत को पीने की जगह उसे अपने पैरों में डालकर व्यर्थ बहा रहा है।

मानव का सबसे बड़ा शत्रु मिथ्यात्व

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु मिथ्यात्व है। मनुष्य के लिए मिथ्यात्व एक रोग है, जिसका इंसान सहज रूप से प्रतिदिन सेवन कर रहा है। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज शुक्रवार सुबह स्कीम नं. 10 स्थित जैन भवन में मंगल प्रवचन दे रहे थे।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस मिथ्यात्व रूपी विष का सहज रूप में सेवन कर रहा है, उसका असर उसे बाद में पता लगेगा, लेकिन जब तक उसे पता लगेगा तब तक वह अपना जीवन मिथ्यात्व रूपी शत्रु को समर्पित कर बैठा होगा। उन्होंने कहा कि अनादि काल से मनुष्य मिथ्यात्व रूपी अंधकार में जी रहा है और उसने कभी मिथ्यात्व से छुटकारा पाने की कोशिश भी नहीं की। आचार्य ने कहा कि इंसान अपने अंदर ज्ञान रूपी प्रकाश को जगाए ताकि उसके अंदर बैठा मिथ्यात्व भाग सके। हम ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति में इंसान अज्ञानी बना हुआ है।

परमेष्ठी को छोड़कर रोटी के पीछे भाग रहा है। उन्होंने कहा कि रोटी से कभी रोटी नहीं मिलती, परमेष्ठी के पुण्य से ही रोटी मिलती है, लेकिन मिथ्यात्व में डूबा इंसान परमेष्ठी को छोड़कर रोटी के लिए अपना घर व अपना देश तक छोड़कर चला जाता है। उन्होंने कहा कि जिसका पुण्य व्यवस्थित रहता है, उसका पूरा जीवन व्यवस्थित रहता है। ब’चों में वहीं संस्कार आएंगे जो माता पिता के है। इसलिए माता पिता को सर्व प्रथम संस्कारी रहना होगा।

पापों से नहीं डरता इंसान

जिस स्थान से भय होता है। इंसान वहां से भागता है लेकिन जीव प्रतिदिन पापों मं लिप्त होकर भी पापों से नहीं डरता।विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि प्राणी सुख तो चाहता है लेकिन सुखी होने का उपाय नहीं करता। भौतिक और इंद्रिय सुख को सुख मान बैठा है। जैसे मुस्कुराते हुए चेहरों को खुशी मान लेते हैं। वास्तव में वह सुख नहंी है सुख तो आत्मा के अंदर बैठे भगवान में हैं। उन्होंने कहा कि जिसके बाद थकान महसूस हो वह कैसा सुख। जीव को जिनवाणी से ज्यादा रोटी पर विश्वास है। यदि जीव जिनवाणी पर विश्वास कर लेता है तो वह भवसागर को पार कर परमपद को प्राप्त करता है। मुनि श्री ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में भाग ले रहे पात्रों को समझाते हुए कहा कि पात्र बदल सकते हैं लेकिन पानी नहीं बदलता। अर्थात इस महोत्सव में सौ धर्म इंद्र से लेकर बने सभी पात्रों का सौभाग्य है कि वह महोत्सव में पात्र बने हैं। मुनि श्री ने कहा कि  जिसके पास सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र का धन होता है वह दिगम्बर होकर घूमता है। अगर राग के बिना नहंी जी पा रहे हो तो जिनेंद्र के शासन में राग करो। कुशासन में राग मत करो। संसार से डरो लेकिन मोक्ष मार्ग से मत डरो, वर्तमान के पापों से डरो, भूतकाल के पापों का पश्चाताप करो।

नेता अकिंचन धर्म का पालन करें

भारत देश में इतनी संपत्ति है कि हमें दुनिया में भटकने की आवश्यकता नहीं है। आप लोगों ने इतना इकठ्ठा कर लिया है कि अंतराय बंध का पाप आप लोगों को लग रहा है। यदि विदेशों में जमा धन वापिस भारत में आ जाए तो भारत पुनः सोने की चिडि़या बन जाएगा। देश के सभी नेता अकिंचन धर्म का पालन कर लें तो सब सुखी हो जाएंगे।

पर वस्तु के संग्रह के कारण लोग गरीबी की ओर जा रहे हैं। ज्ञात एवं अज्ञात भाव से भी आपको पाप का बंध हो रहा है। दिगंबर साधु कभी स्नान नहीं करते और न ही कोई श्रंगार करते हैं। गुलामी के दौरान देश में जब बाहर के सम्राटों और सिकंदर ने भारत आकर सब लूट लिया था। उस समय जंगल में दिगंबर साधु रूके हुए थे। वहां से निकलते हुए उसने अपने कुछ मंत्रियों को मुनि महाराज के पास भेजकर कहा कि आप लोग नग्न अवस्था में क्यों? भारत में इतनी गरीबी है और सोना चांदी, हीरे-जवाहरात और अच्छे अच्छे वस्त्र दे दिए।

लेकिन मुनि महाराज ने उनके मंत्री से कहा कि इन सब चीजों का त्याग कर ही हम इस अवस्था मंे आए हैं। मंत्री से कह दिया कि सिकंदर से कह देना कि जिसको तुम लूट रहे हो, वही तुम्हारे डूबने का कारण बनेगा। तुम्हारे साथ कुछ नहीं जाएगा। उस समय मुनि कल्याणराज ने सिकंदर को कहा था कि तुम्हारा जीवन तीन दिन और है। जो करना चाहते हो कर लो। तब सिकंदर ने अपने दरबारियों से कहा था कि तीन दिन बाद मेरी मौत होने वाली है। मैं घर वापिस नहीं पहुंच सकता हूं। जब मेरी अंतिम यात्रा निकले तो कफन से हाथ बाहर निकाल देना। जिससे पूरे विश्व को मालूम चल जाएगा कि आदमी खाली हाथ ही वापिस जाता है। गरीबों के चेहरे गरीब दिखाई देते हैं। ऐंसा असाता कर्मों के उदय से होता है।

 कौआ बन के जियो, श्वान बन कर नहीं। कौआ को जब कोई दाने मिलते हैं तो वह कांव कांव कर अपने सभी साथियों को बुलाता है। लेकिन जब श्वान को रोटी का टुकडा मिलता है, तो वह उसे उठाकर वहां से भाग जाता है। अपने किसी साथियों को नहीं बुलाता। तू देना नहीं जानता इसलिए भिखारी को आगे भेज देता है। जब कुछ न बचेगा तब ही अकिंचन धर्म होगा। कुछ छोडने का, कुछ ग्रहण करने का भाव है तो यह अकिंचन नहीं है। जो छोडा है और आपकी स्मृति में है, वह भी अंिकंचन नहीं है। अपनी प्रशंसा के लिए कोई पुरूष नहीं कहता है कि अब मेरा सम्मान मत करो।

प्रवचन सुनने के लिए जो घर छोडकर आता है, उसे वापिस जाना होता है। लेकिन जो घर से छूटकर आता है, वह वापिस नहीं जाता है।  बैल को बांधकर घास खिलाई जाए, तो उसे अच्छी नहीं लगती। वह स्वछंद विचरण करके ही आनंद को प्राप्त करता है। एक हाथ से खाना खाने में जो मजा नहीं आता है, वह दोनों हाथों से खाने में मजा आता है और इसका अलग आनंद होता हैै। आदमी कहता है कि वह जेल छोडकर आया है। जबकि वास्तव में उसे कहा जाता है कि वह जेल से छूटकर आया है।

आचार्यश्री ने धवलाजी ग्रंथ में छपे एक किस्से को सुनाते हुए कहा कि जैनमुनि को कालिया नाग की उपमा दी है। जैंसे कालिया नाग अपना मकान नहीं बनाता है और दूसरों के घरों में जाकर रहता है। ऐंसे ही दिगंबर मुनि का अपना मकान नहीं होता है। वह दूसरों के घरों में जाकर रहते हुए विहार करते रहते हैं। निग्रंथ बनना है तो कालिया नाग का जीवन बनकर जीना चाहिए। कहां सुबह और कहां शाम यही मुनि की चर्या होती है। अपना बन के रहने वालों को दुनिया हमेशा अपना कहती है। लेकिन अपना बना के रहेगा तो कोई साथ नहीं देगा। जिनबिंबो के संबंध में कहा कि तीर्थ क्षेत्रों में बने जिनबिंबों के दर्शन करने में पुण्य ज्यादा मिलता है। क्यांेंकि आप अपने नगर के जिनबिंबों में दर्शन करने जाते हैं तो साथ में घर और बाहर की चिंताए लेकर जाते है। लेकिन किसी तीर्थ स्थान पर दर्शन करने जाते हैं तो आपकी वे चिंताए घर में ही रह जाती है। इसलिए तीर्थ क्षेत्र में विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। क्योंकि वहां केवल भगवान ही दिखाई देते हैं और मन की विशुद्धि बढती है।

आचार्य श्री ने कहा कि दस दिन के शिविर में आए लोगों को कितना मजा आ रहा है। सही बात है कि चार दिन को घर छोडा तो इतना सम्मान मिला। अगर पूरे जीवन को घर छोड दोगे तो सम्मान आपके पीछे दौडेगा। क्यांेकि सम्मान पकडने वाले को नहीं, हमेशा छोडने वाले को ज्यादा मिलता है। मांगने वालों से दुनिया घबराती है। लेकिन अकिंचन की प्राप्ति के लिए आपको सब कुछ छोडना होगा। उन्होनें कहा कि आप प्रभु के पास जाएंगे तो परिणाम प्रभु जैंसे होंगे और रागियों के पास जाएंगे तो परिणाम रागियों जैंसे होंगे। मक्खन निकालते समय मरीन निकाल लिया जाता है और यदि यह नहीं निकाला जाए तो घी खराब हो जाता है। एक बार आत्मा भगवत्तव प्राप्त कर ले तो उसे दोबारा संसार में विचरण के लिए नहीं आना पडता है।

आचार्यश्री ने कहा कि जीव सुख से जीना सीख ले तो एक दूसरे को समझाने की आवश्यकता नहीं होगी। दिगंबर मुनि बने बगैर अहिंसा धर्म का पालन नहीं हो सकता। जब तक तिलक लगते रहेंगे। तब तक धर्म शुरू नहीं हो पाएगा। तिलक बंद हो जाने पर ही धर्म की शुरूआत होती है। पूर्वभव के कारण उपकार हो रहे हैं। आचार्यश्री ने कहा कि मंदिरों में नाग निकलते हैं इसका मतलब यह नहीं कि वे कोई देव हैं। बल्कि ये वो लोग होते हैं जो मंदिरों की कुंडी बनाकर उसपर कब्जा किए रहते हैं। चाहे वह मंदिर का कोषाध्यक्ष हो या मंदिर के भवनों पर कब्जा करने वाले लोग। इनको अगले पर्याय में नाग बनकर संसार में विचरण करना होगा।