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जिस प्रकार भाग्यहिन् को रत्न नहीं मिलता ठीक इसी प्रकार अभागे जीव को तीर्थंकर कि मुद्रा , जिनलिंग मुद्रा नहीं मिल सकती

जिस प्रकार भाग्यहिन् को रत्न नहीं मिलता ठीक इसी प्रकार अभागे जीव को तीर्थंकर कि मुद्रा , जिनलिंग, निर्ग्रन्थ मुद्रा नहीं मिल सकती ! और मिल भी जाये तो परिणामो की निर्मलता बहुत कठिन है !
जगत कि यश कीर्ति, प्रसिद्धि , पूजा किसी भी पर्याय मैं मिल सकती है मिथ्या दृष्टि को भी मिल सकती है परन्तु स्वात्मनुभूति दिगंबर पर्याय मैं ही सम्भव है !
हे तन के त्यागियों ! मन के त्यागी भी बनो ! मन का त्याग नहीं होगा तोह तन का त्याग कुछ नहीं कर सकेगा !

धन्य है वे दिगंबर तपोधन – ते अर्घ्य उतरन असि प्रहारण मैं सदा समता धरे ! ऐसे निर्मल वृत्ति के भाव हो तो मुनि बनना !
यदि सिद्ध बनना है तोह अपने मन को मित्र बनाना !

आचार्य श्री बड़ी मीठी डाट लगते हुए कह रहे है अगर योगी अपने ध्यान मैं शुद्ध स्वरूप का ध्यान नहीं करता है तोह वह उसे नहीं प्राप्त का सकता जैसे भाग्य हिन् मनुष्य को रत्न ! …. आचर्य देव सेन स्वामी योगीयो को सम्पूर्ण प्रपंचो से पृथक अपने शुद्धतम स्वरुप मैं तन्मयभूत लीन होने का आदेश /उपदेश दे रहे है !
ध्यान मैं तत्व चिंतन कि महत्व को दर्शाते हुए आचार्य श्री समझा रहे है कि हे योगी तेरी अपने देह जनित सुख से ,पर्याय के सुखो मैं आसक्ति और तत्व चिंतन रहित ध्यान कभी शुद्धतम स्वरुप कि प्राप्ति नहीं करवा पायेगा ! इसलिए इनसे ऊपर ऊठ ( जिन जिनको योगी बन्ने कि भावना है वे इसे गम्भीरता से ले )

परिग्रह कि लालसा मन को कभी स्थिर नही कर सकती

परिग्रह कि लालसा मन को कभी स्थिर नही कर सकती (त्रैकालिक)
विषय कषाय, भोग उपभोग मेरे भव के अभिनन्दन करने मैं निम्मित है ! जो मैं नहीं चाहता
देव शास्त्र गुरु के प्रति अकाट्य श्रद्धा ही मुझे आत्म तत्व कि प्रप्ति मैं सहायक बनेगी !
निज ध्रुव आत्मा ही मेरी परम शरण है। …दिगंबर गुरु शिक्षा दीक्षा तोह दे सकते है परन्तु गुणस्थान नहीं। … उसे तोह मैं अपने परिणामो कि विशुद्धि से प्राप्त करूँगा ! परन्तु गुरु कि सेवा मैं कभी कमी मत छोड़ना ! और प्रत्येक पिच्छी धारी कि विनय करना
ज्ञानी जीव कभी संत भेद पंथ भेद और संघ भेद के विकल्पों मैं नहीं उलझता है। …उसकी दृष्टि चकोर पक्षी कि तरह होती है चकोर पक्षी भूमि पर बैठकर आकाश मैं ही निहारता है ठीक इसी प्रकार तत्वज्ञानी राग द्वेष रुपी संसार मैं रहकर भी उसकी दृष्टि मात्र आत्म लक्ष्य पर निहित होती है
मुमुक्षु जीव वह होता है जो राग द्वेष के कीचड़ मैं पड कर भी अपनी आत्मा को कमल कि भांति बाहर निकाल ले जाता है ! कमल पत्र पर पड़ी पानी कि बूंद अज्ञानी देख रहा है, परन्तु पत्र पर पड़ी होने पर भी यह पत्र रूप नहीं है ! ज्ञानी कि दृष्टि मैं !

वह घर नहीं शमशान है जिस घर मैं निर्ग्रन्थ योगी के चरण ना पड़े

आचार्य कुंदकुंद स्वामीग्रन्थ राज रयण सार जी मैं समझा रहे है कि वह घर नहीं शमशान है जिस घर मैं निर्ग्रन्थ योगी के चरण ना पड़े ! वह मस्तिषक नहीं पाषाण खंड है जो पञ्च परमेष्टि के चरणो मैं नहीं झुका !
धर्म- धर्मात्मा कि खोज वाही करता हिअ जिसके अंदर वीतराग धर्म कि प्राप्ति कि प्यास होती है !
जितना पर परिचय बढ़ेगा उतना आत्मा से अपरिचित रहेगा !
एक मात्र शुद्ध स्वाभाव ही निज आत्मा है, उस और लक्ष्य करो, तुम भी परमानन्द स्वभावी, चैतन्य मालिनी , ज्ञान स्वभावी भगवती आत्मा को प्राप्त कर लोगे !आत्मम स्वभावं पर भाव भिन्नं

सम्यकदृष्टि जीव, भोगो विषय कषायो,वस्तु, धन को इस प्रकार त्यागता है जैसे सुबह मैं आप मल का त्याग करते हो, ! ज्ञानी मल का त्याग करने के बाद आप उसकी और दृष्टि नहीं करते हो न! मैंने इतना छोड़ा, इतना छोड़ा। जा जाकर पूरी दुनिया मैं सुना रहे हो !… ज्ञानी इस सोच का भी त्याग कर देता है और सम भाव को प्राप्त होता है ! शुद्धतम पथ पर अग्रसर होता है !
जो क्रिया भाव से शुन्य है वह फलवती नहीं होती है !
जो जीव देह सुख मैं प्रतिबद्ध है, तत्व विचार से रहित है वह जिव नित्य ध्यान भी करे परन्तु शुद्धात्मा को प्राप्त नही कर सकता !

हे जीव यदि भव का नाश करना चाहता है तो भावो को शुद्ध करो ! भावो कि विशुद्धि ही भव वृद्धि को रोकने मैं सहायक है !
निवृत्ति भी धर्म है प्रवृत्ति भी धर्म है ! अशुभ से निवृत्ति और शुभ मैं प्रवृत्ति इसका नाम चरित्र है !
हे जीव यदि तू तत्त्व ज्ञानी है तो पर्याय के बेर को कभी बेर मत मानना ! और अपने स्व द्रव्य को कभी मत भूलना ! पता नहीं कब तेरा बेरी तेरे सामने ही अपनी परिणति को सम्हाल सिद्धत्व को प्राप्त कर ले और तू देखता ही रह जाये !
मोक्षमार्ग भावुकता का मार्ग नहीं है !

ग्रन्थ राज इष्टोपदेश भाष्य से_पुण्याश्रव संसार का हेतु है परन्तु कब, कोनसी अवस्था मैं

पुण्याश्रव संसार का हेतु है  परन्तु कब, कोनसी अवस्था मैं ?

पूर्वाचार्यों का कथन नया विवक्षा पूर्वक होता है ! यद्यपि   पुण्याश्रव को  परंपरा से निर्वाण का हेतु कहा गया है ! पर यह ध्यान रखना कि सभी जीवो का पुण्य निर्वाण का कारन नहीं है सम्यक दृष्टि जीव का निदान रहित पुण्य परंपरा से निर्वाण का हेतु है  परन्तु मिथ्या दृष्टि जीव का पुण्य तो संसार का ही हेतु है

जब हम बन्ध अपेक्षा कथन करते है, तब पुण्यश्रव भी हेय रूपी आश्र्वो के आभाव से ही होगा,पापाश्रव नरकादि गति का कारन है, इसलिए सर्वथा हेय कहा गया है पुण्यश्रव स्वर्गादि अभ्युदय सुख को प्रदान करता है, संसार सुख अपेक्षा इसे अच्छा माना गया है ! पर स्वर्ग भी संसार है इसलिए निश्चय नय से दोनों ही संसार ही है  स्वर्ग-नरक रूप संसार मैं गुमने वाले हेतुओं को हम उपादेय कैसे कहे !

अहो ज्ञानियो ! इसका तात्पर्य पुण्य क्रियाये छोड़ना नही है   पुण्य कर्म तब तक करते रहना चाहिए जब तक बुद्धि पूर्वक वीतराग चरित्र के अविनाभावी भुत शुद्धोपयोग कि दशा प्राप्त न हो जाये ! तब तक विषय कषाय और दुर्ध्यान  से बचने के लिए दुर्गति का कारन जो पापाश्रव है उससे बचना चाहिए

विशुद्ध वचन

हे जीव  ! देह आदि पर द्रव्य हैं जब तक उन पर ममत्व भाव करता है !  तब तक जीव पर समय मैं रत है ! और नाना प्रकार के कर्मो को बाँधता है !जैसे जैसे जीव ज्ञान को प्राप्त होता है  वैसे वैसे  संयम कि ओर कदम बढ़ते है !

आचर्य वीरसेन स्वामी ने धवला जी मैं लिखा है कि निधत्ति और निकाचित कर्मो का शमन करने के लिए अरहंत भक्ति और भगवन जिनेन्द्र कि देशना असंख्यात गुण श्रेणी कर्मो कि निर्जरा करती है !

जब भूल समझ मैं आ जाती है तो ऐसा कोई विवेकी जीव नहीं होगा जो भूल से भी भूल करे !  कदाचित हमारे जीवन मैं कोई भूल हो चुकी हो तो जिनवाणी का संकेत मिलेगा कि मार्ग वह नहीं है ,मार्ग यह है ! ज्ञानी जीव कभी भूल से भी भूल नहीं करेगा ! भूल का ही परिणाम है कि हम सभी पंचम काल मैं बैठे है!

जिनवाणी को मात्र अलमारी कि शोभा मत बढ़ाना,जिनवाणी को अंतकरण कि शोभा बनाना !

जिनवाणी सुनने मैं सुख महसूस हो रहा है, शांति महसूस होती  है !  बस यही आत्मातित आनंद है !

ज्ञानी को विषयो का सुख उतना कष्टकारी नहीं होता जितना कि विषयो का ताप कष्टकारी होता ! जब तक सूर्य जैसे तपन तुझे विषयो कि नहीं लगेगी तब तक, हे मुमुक्षु तू  मुमुक्षु नहीं बन सकता !

जब तन का राग स्व समय का नाश करता है ! तो जड़ का राग कैसे स्व समय प्राप्त कराएगा !  सच्चा ज्ञानी कहेगा मुझे वस्त्र नही कुटुंब नहीं, परिवार नहीं, मुझे तो बस लक्ष्य दिख रहा है !   वह ही सुसमय है !

जब तक तुम राग रखोगे अनेक प्रकार के कर्म का बंध नियम से होगा ! राग को भूलना कोई वीतरागता नहीं अपितु  राग को छोड़ना भूलना वीतरागता है !

मनीषियों ! भूल मत कर देना घर मे कोई वास्तु पड़ी है फिर भी हमे राग नहीं है !  राग नही तो यह पड़ी कैसे ?  यह सब सामग्री बन्द्ध का हेतु है !

भव्य चातुर्मास कलश स्थापना समारोह, नागपुर -“द्वेष दृष्टि मैं तत्व दृष्टि क़ा सदभाव कहा ?”

परम पूज्य चर्या शिरोमणि आचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ का भव्य चातुर्मास कलश स्थापना समारोह, हेडगेवार भवन , नागपुर मैं दिनांक 27 जुलाई 2013 को मनाया गया !

समारोह मैं  देश सम्पूर्ण देशभर के श्रावको ने आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त किया ! इस अवसर पर जबलपुर, सागर, भोपाल, दुर्ग, झाँसी ललितपुर आगरा, अशोक नगर, पन्ना, अमरावती, सोलापुर, जयपुर, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, बांसवाडा आदि स्थानों से बस भरकर श्रावक महोत्सव का आनंद लेने पहुचे ! आचार्य श्री का भव्य ऐतिहासिक उद्बोधन मैं कहा की संत समाज की आस्था का प्रतिक होता है !

संत की दर्शन ज्ञान विशुद्धि से परिपूर्ण चर्या अनेक जीवो का मोक्ष मार्ग प्रशस्त करती है! उन्हो कहा की पंथ वाद संतवाद और क्षेत्रवाद, सम्यक्द्रिष्टि जीव के लक्षण नहीं है ! सम्यक दृष्टी  का लक्ष्य एक मात्र मोक्ष क़ि प्राप्ति ह द्वेष दृष्टि को तत्व दृष्टि क़ा सदभाव कहा…

सच्चा भाव लिंगी मुनि पर आस्तित्व मैं निज के आस्तित्व की खोज कहा करेगा ! निज गुणों से मंडित है यह स्वयं के द्वारा स्व सम्मान है ! पर सम्मान पराधीन है ! अहंकार भी आ सकता है ! आपके नास्ति धर्म से मेरे आस्ति धर्म क़ा नाश नहीं होता ! ऐसा श्रद्धान जिसे नहीं है वो सम्यक दृष्टि हो नहीं सकता जो जीव पर सम्मान अपमान मैं स्व सम्मान अपमान खोज रहे है! उन्हें स्व आस्तित्व गुण का बोध नहीं है !

तप का फल व्यर्थ नहीं जाता

यदि विधि होगी तो विधि मिलेगी और नहीं होगी तो नहीं मिलेगी। भूख से कम भोजन करना भी बडा तप है। जीव के पुण्य क्षीण होने लगे तो उसके चेहरे से खुशी गायब हो जाती है। उसके भाव विशुद्ध नहीं रहते हैं। तप का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता हैं।

उन्होंने कहा जो विद्यार्थी तपस्या नहीं करता है। वह फेल हो जाता है। विद्यार्थी जीवन में जिसने भी संयम धर्म का पालन कर लिया। तो वह कभी किसी भी परीक्षा में फेल नहीं होता है। उदाहरण देते हुए बताया कि दूध को तपाने के लिए बर्तन की आवश्यकता होती है। और यदि वर्तन न हो तो दूध को तपाया नहीं जा सकता है।

साधना वह है जो नदी की धार बनके बहे। साधना वह नहीं जो बिल्ली की आवाज बनकर निकले। मोक्ष मार्ग की साधना रत्नात्रय के पालन में है। श्रेष्ठ मार्ग से नीचे की ओर उतरना महापुरूषों का काम नहीं है। तीर्थकर संस्कृति, श्रवण संस्कृति में गिरकर मोक्ष मार्ग ग्रहण नहीं किया जाता है। घर में लडडू जब बन पाते है जब चाशनी से तार टूटना प्रारंभ हो जाए।

चमत्कार मात्र आश्चर्य दोष

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि चमत्कार आश्चर्य दोष है।जिनेन्द्र वाणी में सारे तंत्र-मंत्र निहित है, इसलिए अपने को चमत्कारिक शक्तियों में मत उलझाओ।

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन की हर विधा को दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से समझना चाहिए। बीमारी का उपचार चाहिए तो आचार व विचार शुद्ध करो। चांडाल का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने कहा कि चांडाल ने चतुर्दशी के दिन हिंसा न करने का नियम लेकर अपने को धर्मात्मा का पात्र बना लिया, इसलिए इंसान भी अगर नियमों में बंधकर अपना जीवन जीता है तो उसे बिना चमत्कारिक शक्ति के ही अपना जीवन चमत्कारिक लगेगा। उन्होंने कहा कि भगवान की मूर्ति को निहारोगे तो बुद्धि बढ़ेगी, नासाग्र दृष्टि से देखोगे तो बुद्धि बढ़ेगी लेकिन यथार्थ से हटकर कार्य करोगे तो मिथ्यात्व प्रकट होगा। इससे पूर्व मुनि विशोग सागर जी ने कहा कि संसार की वस्तुओं में सुख होता तो तीर्थंकर संसार को क्यों छोड़ते? भरत चक्रवर्ती 6 खण्ड का अधिपति था लेकिन उसे भी संसार के वैभव में सुख नजर नहीं आया। 

जल संरक्षण सबसे बड़ी अहिंसा है

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने जल संरक्षण को अहिंसा परमो धर्म का प्रतीक बताते हुए कहा कि सरकार भले ही जल के प्रति अब जाग रही है लेकिन जैन दर्शन ने बहुत पहले ही जल संरक्षण को महत्व दिया है।

उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ के समय से जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाता रहा है। जितना जल बचाएंगे उतनी ही हिंसा से बचेंगे। उन्होंने जैन समाज के लोगों से पानी की शुद्धता के प्रति जागृति पैदा करने का आह्वान किया। उन्होंने जैन धर्म को मर्यादित धर्म बताते हुए कहा कि गुरू के नाम पर जैन धर्म को मत बांटो क्योंकि जब महावीर एक है तो धर्म अलग -अलग नहीं हो सकता है। इससे पूर्व मुनि विशोग ने प्रवचनों में कहा कि मनुष्य जीवन एक चौराहा है। इंसान नर से नारायण बन सकता है । सम्यक्तव का भाव धारण कर स्वर्ग में भी जा सकता है। मायाचारी और छल-कपट करोगे तो तिर्यंच गति में जाओंगे। अब इंसान को निर्णय करना है कि उसे कहा जाना है। इंसान को जन्म के साथ ही अमृत मिला है। इंसान उस अमृत को पीने की जगह उसे अपने पैरों में डालकर व्यर्थ बहा रहा है।

मानव का सबसे बड़ा शत्रु मिथ्यात्व

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु मिथ्यात्व है। मनुष्य के लिए मिथ्यात्व एक रोग है, जिसका इंसान सहज रूप से प्रतिदिन सेवन कर रहा है। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज शुक्रवार सुबह स्कीम नं. 10 स्थित जैन भवन में मंगल प्रवचन दे रहे थे।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस मिथ्यात्व रूपी विष का सहज रूप में सेवन कर रहा है, उसका असर उसे बाद में पता लगेगा, लेकिन जब तक उसे पता लगेगा तब तक वह अपना जीवन मिथ्यात्व रूपी शत्रु को समर्पित कर बैठा होगा। उन्होंने कहा कि अनादि काल से मनुष्य मिथ्यात्व रूपी अंधकार में जी रहा है और उसने कभी मिथ्यात्व से छुटकारा पाने की कोशिश भी नहीं की। आचार्य ने कहा कि इंसान अपने अंदर ज्ञान रूपी प्रकाश को जगाए ताकि उसके अंदर बैठा मिथ्यात्व भाग सके। हम ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति में इंसान अज्ञानी बना हुआ है।

परमेष्ठी को छोड़कर रोटी के पीछे भाग रहा है। उन्होंने कहा कि रोटी से कभी रोटी नहीं मिलती, परमेष्ठी के पुण्य से ही रोटी मिलती है, लेकिन मिथ्यात्व में डूबा इंसान परमेष्ठी को छोड़कर रोटी के लिए अपना घर व अपना देश तक छोड़कर चला जाता है। उन्होंने कहा कि जिसका पुण्य व्यवस्थित रहता है, उसका पूरा जीवन व्यवस्थित रहता है। ब’चों में वहीं संस्कार आएंगे जो माता पिता के है। इसलिए माता पिता को सर्व प्रथम संस्कारी रहना होगा।