पापों से नहीं डरता इंसान

जिस स्थान से भय होता है। इंसान वहां से भागता है लेकिन जीव प्रतिदिन पापों मं लिप्त होकर भी पापों से नहीं डरता।विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि प्राणी सुख तो चाहता है लेकिन सुखी होने का उपाय नहीं करता। भौतिक और इंद्रिय सुख को सुख मान बैठा है। जैसे मुस्कुराते हुए चेहरों को खुशी मान लेते हैं। वास्तव में वह सुख नहंी है सुख तो आत्मा के अंदर बैठे भगवान में हैं। उन्होंने कहा कि जिसके बाद थकान महसूस हो वह कैसा सुख। जीव को जिनवाणी से ज्यादा रोटी पर विश्वास है। यदि जीव जिनवाणी पर विश्वास कर लेता है तो वह भवसागर को पार कर परमपद को प्राप्त करता है। मुनि श्री ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में भाग ले रहे पात्रों को समझाते हुए कहा कि पात्र बदल सकते हैं लेकिन पानी नहीं बदलता। अर्थात इस महोत्सव में सौ धर्म इंद्र से लेकर बने सभी पात्रों का सौभाग्य है कि वह महोत्सव में पात्र बने हैं। मुनि श्री ने कहा कि  जिसके पास सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र का धन होता है वह दिगम्बर होकर घूमता है। अगर राग के बिना नहंी जी पा रहे हो तो जिनेंद्र के शासन में राग करो। कुशासन में राग मत करो। संसार से डरो लेकिन मोक्ष मार्ग से मत डरो, वर्तमान के पापों से डरो, भूतकाल के पापों का पश्चाताप करो।

One comment

  1. mayank says:

    namostu sashan jayvant ho