मानव का सबसे बड़ा शत्रु मिथ्यात्व

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु मिथ्यात्व है। मनुष्य के लिए मिथ्यात्व एक रोग है, जिसका इंसान सहज रूप से प्रतिदिन सेवन कर रहा है। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज शुक्रवार सुबह स्कीम नं. 10 स्थित जैन भवन में मंगल प्रवचन दे रहे थे।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस मिथ्यात्व रूपी विष का सहज रूप में सेवन कर रहा है, उसका असर उसे बाद में पता लगेगा, लेकिन जब तक उसे पता लगेगा तब तक वह अपना जीवन मिथ्यात्व रूपी शत्रु को समर्पित कर बैठा होगा। उन्होंने कहा कि अनादि काल से मनुष्य मिथ्यात्व रूपी अंधकार में जी रहा है और उसने कभी मिथ्यात्व से छुटकारा पाने की कोशिश भी नहीं की। आचार्य ने कहा कि इंसान अपने अंदर ज्ञान रूपी प्रकाश को जगाए ताकि उसके अंदर बैठा मिथ्यात्व भाग सके। हम ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति में इंसान अज्ञानी बना हुआ है।

परमेष्ठी को छोड़कर रोटी के पीछे भाग रहा है। उन्होंने कहा कि रोटी से कभी रोटी नहीं मिलती, परमेष्ठी के पुण्य से ही रोटी मिलती है, लेकिन मिथ्यात्व में डूबा इंसान परमेष्ठी को छोड़कर रोटी के लिए अपना घर व अपना देश तक छोड़कर चला जाता है। उन्होंने कहा कि जिसका पुण्य व्यवस्थित रहता है, उसका पूरा जीवन व्यवस्थित रहता है। ब’चों में वहीं संस्कार आएंगे जो माता पिता के है। इसलिए माता पिता को सर्व प्रथम संस्कारी रहना होगा।

One comment

  1. R K Jain says:

    Ach shree ka darshan gyan charita .. chaturtha kaal ke muniyo samaan hai.. jis jeev ne unki anekant swadhwani ka shraddhan purvak ek bar bhi paan kar liya .. uska aatm kalyan ka marg prashst ho jata hai…. Namostu shasan Jaywant ho..