जल संरक्षण सबसे बड़ी अहिंसा है

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने जल संरक्षण को अहिंसा परमो धर्म का प्रतीक बताते हुए कहा कि सरकार भले ही जल के प्रति अब जाग रही है लेकिन जैन दर्शन ने बहुत पहले ही जल संरक्षण को महत्व दिया है।

उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ के समय से जल संरक्षण पर ध्यान दिया जाता रहा है। जितना जल बचाएंगे उतनी ही हिंसा से बचेंगे। उन्होंने जैन समाज के लोगों से पानी की शुद्धता के प्रति जागृति पैदा करने का आह्वान किया। उन्होंने जैन धर्म को मर्यादित धर्म बताते हुए कहा कि गुरू के नाम पर जैन धर्म को मत बांटो क्योंकि जब महावीर एक है तो धर्म अलग -अलग नहीं हो सकता है। इससे पूर्व मुनि विशोग ने प्रवचनों में कहा कि मनुष्य जीवन एक चौराहा है। इंसान नर से नारायण बन सकता है । सम्यक्तव का भाव धारण कर स्वर्ग में भी जा सकता है। मायाचारी और छल-कपट करोगे तो तिर्यंच गति में जाओंगे। अब इंसान को निर्णय करना है कि उसे कहा जाना है। इंसान को जन्म के साथ ही अमृत मिला है। इंसान उस अमृत को पीने की जगह उसे अपने पैरों में डालकर व्यर्थ बहा रहा है।