चमत्कार मात्र आश्चर्य दोष

आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि चमत्कार आश्चर्य दोष है।जिनेन्द्र वाणी में सारे तंत्र-मंत्र निहित है, इसलिए अपने को चमत्कारिक शक्तियों में मत उलझाओ।

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन की हर विधा को दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से समझना चाहिए। बीमारी का उपचार चाहिए तो आचार व विचार शुद्ध करो। चांडाल का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य ने कहा कि चांडाल ने चतुर्दशी के दिन हिंसा न करने का नियम लेकर अपने को धर्मात्मा का पात्र बना लिया, इसलिए इंसान भी अगर नियमों में बंधकर अपना जीवन जीता है तो उसे बिना चमत्कारिक शक्ति के ही अपना जीवन चमत्कारिक लगेगा। उन्होंने कहा कि भगवान की मूर्ति को निहारोगे तो बुद्धि बढ़ेगी, नासाग्र दृष्टि से देखोगे तो बुद्धि बढ़ेगी लेकिन यथार्थ से हटकर कार्य करोगे तो मिथ्यात्व प्रकट होगा। इससे पूर्व मुनि विशोग सागर जी ने कहा कि संसार की वस्तुओं में सुख होता तो तीर्थंकर संसार को क्यों छोड़ते? भरत चक्रवर्ती 6 खण्ड का अधिपति था लेकिन उसे भी संसार के वैभव में सुख नजर नहीं आया। 

One comment

  1. sachin jain lucky says:

    namostu shasan jai bant ho jai jai gurudev