विशुद्ध वचन

हे जीव  ! देह आदि पर द्रव्य हैं जब तक उन पर ममत्व भाव करता है !  तब तक जीव पर समय मैं रत है ! और नाना प्रकार के कर्मो को बाँधता है !जैसे जैसे जीव ज्ञान को प्राप्त होता है  वैसे वैसे  संयम कि ओर कदम बढ़ते है !

आचर्य वीरसेन स्वामी ने धवला जी मैं लिखा है कि निधत्ति और निकाचित कर्मो का शमन करने के लिए अरहंत भक्ति और भगवन जिनेन्द्र कि देशना असंख्यात गुण श्रेणी कर्मो कि निर्जरा करती है !

जब भूल समझ मैं आ जाती है तो ऐसा कोई विवेकी जीव नहीं होगा जो भूल से भी भूल करे !  कदाचित हमारे जीवन मैं कोई भूल हो चुकी हो तो जिनवाणी का संकेत मिलेगा कि मार्ग वह नहीं है ,मार्ग यह है ! ज्ञानी जीव कभी भूल से भी भूल नहीं करेगा ! भूल का ही परिणाम है कि हम सभी पंचम काल मैं बैठे है!

जिनवाणी को मात्र अलमारी कि शोभा मत बढ़ाना,जिनवाणी को अंतकरण कि शोभा बनाना !

जिनवाणी सुनने मैं सुख महसूस हो रहा है, शांति महसूस होती  है !  बस यही आत्मातित आनंद है !

ज्ञानी को विषयो का सुख उतना कष्टकारी नहीं होता जितना कि विषयो का ताप कष्टकारी होता ! जब तक सूर्य जैसे तपन तुझे विषयो कि नहीं लगेगी तब तक, हे मुमुक्षु तू  मुमुक्षु नहीं बन सकता !

जब तन का राग स्व समय का नाश करता है ! तो जड़ का राग कैसे स्व समय प्राप्त कराएगा !  सच्चा ज्ञानी कहेगा मुझे वस्त्र नही कुटुंब नहीं, परिवार नहीं, मुझे तो बस लक्ष्य दिख रहा है !   वह ही सुसमय है !

जब तक तुम राग रखोगे अनेक प्रकार के कर्म का बंध नियम से होगा ! राग को भूलना कोई वीतरागता नहीं अपितु  राग को छोड़ना भूलना वीतरागता है !

मनीषियों ! भूल मत कर देना घर मे कोई वास्तु पड़ी है फिर भी हमे राग नहीं है !  राग नही तो यह पड़ी कैसे ?  यह सब सामग्री बन्द्ध का हेतु है !