ग्रन्थ राज इष्टोपदेश भाष्य से_पुण्याश्रव संसार का हेतु है परन्तु कब, कोनसी अवस्था मैं

पुण्याश्रव संसार का हेतु है  परन्तु कब, कोनसी अवस्था मैं ?

पूर्वाचार्यों का कथन नया विवक्षा पूर्वक होता है ! यद्यपि   पुण्याश्रव को  परंपरा से निर्वाण का हेतु कहा गया है ! पर यह ध्यान रखना कि सभी जीवो का पुण्य निर्वाण का कारन नहीं है सम्यक दृष्टि जीव का निदान रहित पुण्य परंपरा से निर्वाण का हेतु है  परन्तु मिथ्या दृष्टि जीव का पुण्य तो संसार का ही हेतु है

जब हम बन्ध अपेक्षा कथन करते है, तब पुण्यश्रव भी हेय रूपी आश्र्वो के आभाव से ही होगा,पापाश्रव नरकादि गति का कारन है, इसलिए सर्वथा हेय कहा गया है पुण्यश्रव स्वर्गादि अभ्युदय सुख को प्रदान करता है, संसार सुख अपेक्षा इसे अच्छा माना गया है ! पर स्वर्ग भी संसार है इसलिए निश्चय नय से दोनों ही संसार ही है  स्वर्ग-नरक रूप संसार मैं गुमने वाले हेतुओं को हम उपादेय कैसे कहे !

अहो ज्ञानियो ! इसका तात्पर्य पुण्य क्रियाये छोड़ना नही है   पुण्य कर्म तब तक करते रहना चाहिए जब तक बुद्धि पूर्वक वीतराग चरित्र के अविनाभावी भुत शुद्धोपयोग कि दशा प्राप्त न हो जाये ! तब तक विषय कषाय और दुर्ध्यान  से बचने के लिए दुर्गति का कारन जो पापाश्रव है उससे बचना चाहिए