वह घर नहीं शमशान है जिस घर मैं निर्ग्रन्थ योगी के चरण ना पड़े

आचार्य कुंदकुंद स्वामीग्रन्थ राज रयण सार जी मैं समझा रहे है कि वह घर नहीं शमशान है जिस घर मैं निर्ग्रन्थ योगी के चरण ना पड़े ! वह मस्तिषक नहीं पाषाण खंड है जो पञ्च परमेष्टि के चरणो मैं नहीं झुका !
धर्म- धर्मात्मा कि खोज वाही करता हिअ जिसके अंदर वीतराग धर्म कि प्राप्ति कि प्यास होती है !
जितना पर परिचय बढ़ेगा उतना आत्मा से अपरिचित रहेगा !
एक मात्र शुद्ध स्वाभाव ही निज आत्मा है, उस और लक्ष्य करो, तुम भी परमानन्द स्वभावी, चैतन्य मालिनी , ज्ञान स्वभावी भगवती आत्मा को प्राप्त कर लोगे !आत्मम स्वभावं पर भाव भिन्नं

सम्यकदृष्टि जीव, भोगो विषय कषायो,वस्तु, धन को इस प्रकार त्यागता है जैसे सुबह मैं आप मल का त्याग करते हो, ! ज्ञानी मल का त्याग करने के बाद आप उसकी और दृष्टि नहीं करते हो न! मैंने इतना छोड़ा, इतना छोड़ा। जा जाकर पूरी दुनिया मैं सुना रहे हो !… ज्ञानी इस सोच का भी त्याग कर देता है और सम भाव को प्राप्त होता है ! शुद्धतम पथ पर अग्रसर होता है !
जो क्रिया भाव से शुन्य है वह फलवती नहीं होती है !
जो जीव देह सुख मैं प्रतिबद्ध है, तत्व विचार से रहित है वह जिव नित्य ध्यान भी करे परन्तु शुद्धात्मा को प्राप्त नही कर सकता !

हे जीव यदि भव का नाश करना चाहता है तो भावो को शुद्ध करो ! भावो कि विशुद्धि ही भव वृद्धि को रोकने मैं सहायक है !
निवृत्ति भी धर्म है प्रवृत्ति भी धर्म है ! अशुभ से निवृत्ति और शुभ मैं प्रवृत्ति इसका नाम चरित्र है !
हे जीव यदि तू तत्त्व ज्ञानी है तो पर्याय के बेर को कभी बेर मत मानना ! और अपने स्व द्रव्य को कभी मत भूलना ! पता नहीं कब तेरा बेरी तेरे सामने ही अपनी परिणति को सम्हाल सिद्धत्व को प्राप्त कर ले और तू देखता ही रह जाये !
मोक्षमार्ग भावुकता का मार्ग नहीं है !