परिग्रह कि लालसा मन को कभी स्थिर नही कर सकती

परिग्रह कि लालसा मन को कभी स्थिर नही कर सकती (त्रैकालिक)
विषय कषाय, भोग उपभोग मेरे भव के अभिनन्दन करने मैं निम्मित है ! जो मैं नहीं चाहता
देव शास्त्र गुरु के प्रति अकाट्य श्रद्धा ही मुझे आत्म तत्व कि प्रप्ति मैं सहायक बनेगी !
निज ध्रुव आत्मा ही मेरी परम शरण है। …दिगंबर गुरु शिक्षा दीक्षा तोह दे सकते है परन्तु गुणस्थान नहीं। … उसे तोह मैं अपने परिणामो कि विशुद्धि से प्राप्त करूँगा ! परन्तु गुरु कि सेवा मैं कभी कमी मत छोड़ना ! और प्रत्येक पिच्छी धारी कि विनय करना
ज्ञानी जीव कभी संत भेद पंथ भेद और संघ भेद के विकल्पों मैं नहीं उलझता है। …उसकी दृष्टि चकोर पक्षी कि तरह होती है चकोर पक्षी भूमि पर बैठकर आकाश मैं ही निहारता है ठीक इसी प्रकार तत्वज्ञानी राग द्वेष रुपी संसार मैं रहकर भी उसकी दृष्टि मात्र आत्म लक्ष्य पर निहित होती है
मुमुक्षु जीव वह होता है जो राग द्वेष के कीचड़ मैं पड कर भी अपनी आत्मा को कमल कि भांति बाहर निकाल ले जाता है ! कमल पत्र पर पड़ी पानी कि बूंद अज्ञानी देख रहा है, परन्तु पत्र पर पड़ी होने पर भी यह पत्र रूप नहीं है ! ज्ञानी कि दृष्टि मैं !