जैन धर्म

जैन धर्म की प्राचीनता
विश्व के सभी धर्मों से जैन धर्म प्राचीन है। कुछ लोगों का यह मानना कि जैन धर्म का प्रारम्भ महावीर स्वामी के समय से हुआ है, नितान्त भ्रामक है। महावीर भगवान तो वर्तमान काल की दृष्टि से जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर हुये हैं। उनसे पूर्व 23 तीर्थकर और हो चुके हैं जिनमें प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव हैं।

जैन धर्म अनादि है
जैन आगम के अनुसार भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र में प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल में 24-24 तीर्थकर होते हैं। अभी तक अनन्त अवसपिर्णी और उत्सर्पिणी काल हो चुके हैं। इस प्रकार अभी तक इन कालों में 24-24 तीथर्कर अनन्त काल से होते आ रहे हैं। इस प्रकार जैन धर्म भी अनादि काल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा।

‘जैन’ कहते हैं उन्हें, जो ‘जिन’ के अनुयायी हों। ‘जिन’ शब्द बना है ‘जि’ धातु से। ‘जि’ माने-जीतना। ‘जिन’ माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं ‘जिन’। जैन धर्म अर्थात ‘जिन’ भगवान्‌ का धर्म।  जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र है-

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

अर्थात अरिहंतों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पाँच परमेष्ठी हैं।

धन दे के तन राखिए, तन दे रखिए लाज
धन दे, तन दे, लाज दे, एक धर्म के काज।
धर्म करत संसार सुख, धर्म करत निर्वाण
धर्म ग्रंथ साधे बिना, नर तिर्यंच समान।

जिन शासन में कहा है कि वस्त्रधारी पुरुष सिद्धि को प्राप्त नहीं होता। भले ही वह तीर्थंकर ही क्यों न हो, नग्नवेश ही मोक्ष मार्ग है, शेष सब उन्मार्ग है- मिथ्या मार्ग है।

– आचार्य कुंदकुंद